Monday, May 19, 2008

अब ये देश जला दो

राम मरे रावण के हाथों, सीता मैय्या जल गई
गुरुग्रंथ बस ग्रंथ बन गया, उमर बुद्ध की ढल गई
कुछ भी नहीं है शेष, अब ये देश जला दो.
मुसलमान ने हिन्दु मारा, खुदा हुए परेशान
हिन्दु ने हथियार उठाया, अब रोया भगवान
मंदिर मस्जिद सब घबराये, खतरे में है जान
हँसता है हैवान, ना मिलता एक भी अब इंसान
धर्म का ये संदेश कि अब ये देश जला दो.
मधुशाला की साकी को, खुद मदिरालय ने मारा
हिमगिरि का उत्तुंग शिखर भी, मूक रहा बेचारा
हारेको हरिनाम मिले क्या? हरि स्वयं भी हारा
भरा है कोलाहल से, सूखी कविता धारा
दंग है हर दर्वेश तो अब ये देश जला दो.

खून रोज ही देते हैं, आजादी ना मिल पाई
सुरसा के मुख के जैसे, बढ़ती है मंहगाई
संसद में बरसात, बदली है सारे देश में छाई
लोग कहीं और तंत्र कहीं हैं, लोकतंत्र है भाई
लो माचिस है पेश, अब ये देश जला दो.

...विकास
कुमार


1 comment:

Vikash said...

Thanks for including my poem at your blog. You might want to link it to the original page: http://vikashkablog.blogspot.com/2008/05/blog-post.html