Monday, May 19, 2008

मां की खामोशी

मैने मां को हमेशा खामोश देखा है
कभी शराब मे धुत
बाबा के जूते उतारते हुए
कभी दादी मां के ताने सुनते हुए
कभी भाभियों के गिले सुनते हुए
कभी मेरी पत्नी के उल्हाने सुनते हुए
कभी उफ तक नही सुनी
एक अजीब सा खालीपन देखा है
मैने उनकी आंखों मे
मेरा बेटा जिसे वो हमेशा
सीने से लगाये घूमती रह्ती थी
आज जब वो बड़ा हो गया है
वो भी उन से जुबान चलाता है
वो चुपचाप सुनती रहती है
उसकी जलीकटी बातें
आज मदर डे है
मां का दिन है आज
और उसे कुछ पता ही नही है
वो आज भी खामोश है
हमेशा की तरह्
क्या वो हमेशा खामोश रहेगी
नही, आज मै उनकी खामोशी
को हमेशा के लिये तोड़ दूंगा
ताकि वो भी मुस्कुरा सके

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