Monday, March 31, 2008

मां...

फिर बादल घनेरे घिर आये
मां की मेरी याद लाये
फिर तड़पा उसके आंचल को
उसके बोलों सी ठंडक ले आये

मां, तुम बादल सी मुझको लगती हो
तपते दिल पर ठंडक सी लगती हो,
बादल के बनते कई रूपों में
मेरे बचपन की कहानीयां लगती हो।

तुम्हारी कहानीयां याद आती हैं मां,
वो बंदर, शेर, खरगोश और मछ्लीयां,
आज फिर सो जाऊं तेरी गोद में,
मां फिर से मुझे वो कहानीयां सुना

जीवन मे जब न होगी तू कल
कैसे बीतेंगे मेरे वो पल,
चल मां, मेरी ऊंगली को पकड़
कुछ दूर साथ तू चल।

1 comment:

Anonymous said...

विकास यादव, जी आपके द्वारा लीखी गई कविता मां को पढकर मेरा दिल भर आया क्‍योंकि मैं अपनी मां से सरकारी नौकरी की वजह अपनी मां से काफी दुर रहता हुं, इस कविता ने मुझे मेरे मां की याद दिला दी
आपका
KRISHNA KANT YADAV